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मुद्दे की बात... भागीरथपुरा... कुर्सियां बदलीं... क्या जिम्मेदारी भी बदलेगी...?इस पुरे मामले में जवाबदेही कहां है...?

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✍️ संवाददाता: इंदाैर  |  🖊️ संपादन: MP जनमत

03 जनवरी 2026

इंदाैर

✍️ ऋतिक विश्वकर्मा...

इंदाैर में भागीरथपुरा की घटना को अगर एक पंक्ति में समझना हो… तो इतना कहना काफी है कि यह सिर्फ एक हादसा नहीं था… यह सिस्टम की पोल खोलने वाला मामला था… यह घटना अचानक नहीं हुई… इसके पीछे लापरवाही… अनदेखी… और जिम्मेदारी से बचने की एक लंबी कड़ी छिपी हुई है… लेकिन अफसोस यह है कि जब सच सामने आया… तो जवाब तलाशने के बजाय प्रशासन ने वही पुराना रास्ता चुना… तबादले…


नगर निगम में कुछ अधिकारियों के तबादले कर दिए गए… कागजों में यह कार्रवाई बड़ी दिखाई देती है… फाइलें चलती हैं… आदेश निकलते है और फिर यह मान लिया जाता है कि काम हो गया… लेकिन सवाल वही पुराना है… क्या तबादला ही सजा है… क्या कुर्सी बदल देने से गलती मिट जाती है… या फिर यह केवल समय खरीदने का तरीका है… ताकि मामला ठंडा पड़ जाए…


भागीरथपुरा की घटना ने यह साफ दिखा दिया कि समस्या किसी एक व्यक्ति की नहीं… बल्कि पूरी व्यवस्था की है… जब किसी इलाके में लंबे समय से लापरवाही चल रही हो… जब निगरानी नाम की चीज दिखाई न दे… जब शिकायतें सिर्फ दर्ज होकर धूल खाती रहें… तो फिर एक दिन कुछ न कुछ होना तय होता है… और जब वह होता है… तब हम कहते हैं… यह तो हादसा था…


असल सवाल हादसे का नहीं है… असल सवाल यह है कि हादसे से पहले क्या किया गया… कौन जिम्मेदार था… किसकी ड्यूटी थी… किसने आंखें बंद रखीं… इन सवालों पर अक्सर चुप्पी छा जाती है… भागीराथपुरा में भी वही हुआ… घटना के बाद तबादले हुए… लेकिन यह साफ नहीं किया गया कि गलती किस स्तर पर हुई… और उस गलती की जिम्मेदारी किसने ली…


यह पहली बार नहीं है कि किसी बड़ी घटना के बाद तबादलों को ही समाधान मान लिया गया हो… यह हमारे सिस्टम की सबसे आसान और सुरक्षित कार्रवाई है… इसमें न किसी को दोषी ठहराना पड़ता है… न किसी जांच का सामना करना पड़ता है… और न ही किसी जवाबदेही का बोझ उठाना पड़ता है… अधिकारी एक जगह से दूसरी जगह भेज दिए जाते हैं… और मामला वहीं खत्म मान लिया जाता है…


लेकिन जनता अब इतनी भोली नहीं रही… भागीराथपुरा के लोग यह नहीं पूछ रहे कि कौन अधिकारी कहां गया… वे यह पूछ रहे हैं कि ऐसी घटना दोबारा न हो… इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा… वे यह जानना चाहते हैं कि सिस्टम में सुधार होगा या नहीं… सिर्फ नाम बदलने से… कुर्सी बदलने से… जिम्मेदारी नहीं बदलती… यह बात अब आम लोग भी समझने लगे हैं…


तबादले कभी-कभी जरूरी होते हैं… इसमें कोई दो राय नहीं… लेकिन जब हर बड़ी गड़बड़ी के बाद तबादला ही आखिरी जवाब बन जाए… तो उस पर सवाल उठना लाजमी है… क्या किसी अधिकारी की जवाबदेही तय हुई… क्या किसी पर जांच बैठी… क्या किसी रिपोर्ट को सार्वजनिक किया गया… भागीरथपुरा के मामले में इन सवालों का जवाब अब तक साफ तौर पर नहीं मिला है…


सबसे खतरनाक बात यह है कि सिस्टम अक्सर यह मानकर चलता है कि कुछ दिन शोर होगा… फिर सब शांत हो जाएगा… खबरें बदल जाएंगी… ध्यान कहीं और चला जाएगा… और मामला फाइलों में दब जाएगा… लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता… कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं… जो लंबे समय तक सवाल बनकर खड़ी रहती हैं… भागीराथपुरा भी उन्हीं में से एक है…


यह मामला नगर निगम प्रशासन के लिए चेतावनी होना चाहिए… चेतावनी इस बात की कि अब सिर्फ दिखावटी कार्रवाई से काम नहीं चलेगा… अगर सच में सुधार चाहिए… तो गलती को स्वीकार करना होगा… जिम्मेदार तय करने होंगे… और सबसे जरूरी बात… उस सुधार को जमीन पर उतारना होगा…


शहर का नागरिक सिर्फ सुविधाएं नहीं मांगता… वह सुरक्षा और भरोसा भी चाहता है… जब भरोसा टूटता है… तो सिर्फ एक इलाका नहीं… पूरी व्यवस्था सवालों के घेरे में आ जाती है… भागीराथपुरा की घटना ने यही किया है… इसने दिखा दिया है कि अगर समय रहते जवाबदेही तय नहीं हुई… तो अगला भागीराथपुरा कहीं और पैदा हो सकता है…


अंत में एमपी जनमत का प्रश्न जिम्मेदाराें से वही है… क्या भागीरथपुरा के बाद बदली सिर्फ कुर्सियां हैं… या सोच भी बदलेगी… अगर सोच नहीं बदली… तो तबादले सिर्फ कागजों में अच्छे लगेंगे… जमीन पर वही हालात रहेंगे… और फिर किसी और दिन… किसी और जगह… हम फिर किसी नई घटना पर यही सवाल पूछते नजर आएंगे… यही मुद्दे की बात है…

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