सरकारी लापरवाही का स्मारक : बिना पानी, बिना टंकी, बिना निजता… कॉलेज ग्राउंड का पुरुष शौचालय सिस्टम पर बड़ा सवाल...
06 जनवरी 2026
झाबुआ
कॉलेज ग्राउंड में बना पुरुष शौचालय… सुविधा नहीं… सिस्टम की नाकामी का आईना…
झाबुआ। कॉलेज ग्राउंड परिसर में खड़ा यह पुरुष शौचालय किसी अधूरे निर्माण का उदाहरण भर नहीं है… यह उस व्यवस्था की सच्चाई है जो कागजों में हर काम पूरा दिखा देती है… और जमीन पर अधूरा सच छोड़ देती है… सुबह-सुबह भारी संख्या में मॉर्निंग वॉक करने वाले… खिलाड़ी… छात्र… कर्मचारी और आम नागरिक जिस सार्वजनिक परिसर में आते हैं… वहां यह शौचालय सुविधा देने के बजाय असुविधा और अव्यवस्था का स्थायी प्रतीक बन चुका है…

इस पुरुष शौचालय में न पानी की टंकी है… न नलों में पानी की कोई आपूर्ति… न फ्लश सिस्टम काम करने की स्थिति में है… ऐसे में सवाल खुद-ब-खुद खड़ा होता है… जब पानी ही नहीं… तो शौचालय का उपयोग कैसे होगा… और जब टंकी ही नहीं लगाई गई… तो नल और फिटिंग लगाकर किसे यह भरोसा दिलाया गया कि यहां सुविधा मौजूद है…
दीवार पर वॉशबेसिन टांगा गया है… लेकिन वह भी सिर्फ दिखावे के लिए… न उसमें पानी है… न साबुन… न हाथ धोने की कोई व्यावहारिक व्यवस्था… जब हाथ धोने का पानी ही उपलब्ध नहीं… तो यह बेसिन किस काम का है… यह दृश्य साफ करता है कि जरूरत नहीं… बल्कि औपचारिकता निभाई गई है…

शौचालय कक्षों में दरवाजों का नामोनिशान तक नहीं है… न न्यूनतम निजता… न उपयोगकर्ताओं की गरिमा का कोई ध्यान… सार्वजनिक स्थल पर बने पुरुष शौचालय की यह हालत यह बताने के लिए काफी है कि योजना बनाते समय जमीनी हकीकत को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया…

निर्माण की गुणवत्ता भी अपनी कहानी खुद कह रही है… नई-नई लगी टाइल्स जगह-जगह से उखड़ने लगी हैं… फर्श पर सीमेंट के अवशेष और गंदगी फैली हुई है… जॉइंटिंग अधूरी है… और पूरा काम लापरवाही की गवाही दे रहा है… अगर निर्माण के कुछ ही समय बाद यह स्थिति है… तो आने वाले समय में इस ढांचे का क्या होगा… इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं…

कॉलेज ग्राउंड शहर का प्रमुख सार्वजनिक परिसर है… जहां रोजाना सैकड़ों लोगों की आवाजाही रहती है… ऐसे स्थान पर पुरुष शौचालय की यह दुर्दशा किसी तकनीकी चूक का मामला नहीं… बल्कि प्रशासनिक उदासीनता और निगरानी तंत्र की पूरी विफलता को उजागर करती है…
सबसे बड़ा सवाल यही है… क्या बिना पानी… बिना टंकी… बिना दरवाजे के ही इस निर्माण को पूरा घोषित कर दिया गया… क्या भुगतान कर दिया गया… किस इंजीनियर ने गुणवत्ता जांच के नाम पर इस पर मुहर लगाई… और किस अधिकारी ने आंख मूंदकर हस्ताक्षर कर दिए…
यह मामला सिर्फ एक पुरुष शौचालय का नहीं… यह उस सिस्टम की कहानी है… जहां योजनाएं जनता की सुविधा के लिए नहीं… बल्कि फाइलें भरने और बिल पास कराने के लिए चलाई जाती हैं… कॉलेज ग्राउंड में खड़ा यह ढांचा हर रोज यही सवाल करता है… यह निर्माण जनता के लिए था… या सिर्फ कागजों के लिए…





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