क्या यही है सरकारी हॉस्टलों की हकीकत...? थाली में इल्ली की तस्वीरें… भविष्य गढ़ने वाले हॉस्टल में सड़ा खाना… यह अपराध नहीं तो क्या है...?
07 जनवरी 2026
भाेपाल
थाली में इल्ली…
व्यवस्था में सन्नाटा…
भाेपाल। सिहोर का अंबेडकर ITI हॉस्टल आज एक इमारत नहीं रहा… वह एक सवाल बन गया है… ऐसा सवाल, जो थाली से निकलकर सीधे सत्ता के दरवाजे पर दस्तक देता है… छात्राओं की थाली में रेंगती इल्ली… बर्तनों में बदबू मारता पानी… परिसर में घूमते कॉकरोच… यह कोई आरोप नहीं… यह तस्वीरों में कैद हकीकत है…

अगर विकास सच में जमीन पर उतर आया होता… अगर नारी सम्मान सिर्फ मंचों की भाषा नहीं होता… तो यह दृश्य कभी कैमरे में कैद नहीं होता… लेकिन यहां तस्वीरें बोल रही हैं… और सिस्टम मौन साधे बैठा है…

जिस हॉस्टल का नाम डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम पर है… वहां छात्राओं को बुनियादी गरिमा तक नसीब नहीं… अंबेडकर का नाम बोर्ड पर चमकता है… लेकिन जमीन पर व्यवस्था दम तोड़ रही है… यह कैसी विडंबना है कि सामाजिक न्याय के प्रतीक के नाम पर चल रहे संस्थान में सबसे ज्यादा अन्याय छात्राओं के साथ हो रहा है…

छात्राएं कहती हैं… खाना खराब है… पानी बदबूदार है… सफाई नाम की कोई चीज नहीं… जवाब में वही घिसे-पिटे बहाने… “जांच कराएंगे”… “ठेकेदार बदले जाएंगे”… “आज ऐसा हो गया”… सवाल यह नहीं कि आज हुआ या रोज होता है… सवाल यह है कि क्या इल्ली कभी भी स्वीकार्य हो सकती है…
हॉस्टल व्यवस्था में अगर कोई सबसे सुरक्षित है… तो वह ठेकेदार है… खाना वही देगा… पानी वही सप्लाई करेगा… सफाई वही कराएगा… और गलती होने पर भी वही बचेगा… अफसर आएंगे… फाइल देखेंगे… फोटो खिंचवाएंगे… भरोसा दिलाएंगे… और चले जाएंगे…

क्या वार्डन ने खाना चखा…?
क्या पानी की नियमित जांच हुई…?
क्या निरीक्षण सिर्फ कागजों तक सीमित है…?
प्रदेश में नारे बड़े हैं… “बेटी बचाओ”… “बेटी पढ़ाओ”… “नारी सशक्तिकरण”… लेकिन सीहोर के इस हॉस्टल में न बेटी सुरक्षित है… न स्वस्थ… न सम्मानित… पोस्टर दीवारों पर टंगे हैं… और व्यवस्था थाली में सड़ रही है…

ये छात्राएं सिर्फ हॉस्टल की निवासी नहीं हैं… ये प्रदेश का भविष्य हैं… ITI में पढ़कर आत्मनिर्भर बनने का सपना देख रही हैं… लेकिन अगर रोज दूषित पानी पिएंगी… सड़ा भोजन खाएंगी… तो पढ़ाई कैसे होगी… यह लापरवाही नहीं… यह भविष्य के साथ अपराध है…
अब सवाल बहुत सीधे हैं…
क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी…?
क्या ठेकेदार का अनुबंध रद्द होगा…?
क्या छात्राओं की मेडिकल जांच और सुरक्षित भोजन-पानी की गारंटी मिलेगी…?
या फिर हंगामा ठंडा होते ही सब कुछ “नॉर्मल” हो जाएगा…?
आज सीहोर है… कल किसी और जिले का नाम होगा… तस्वीरें बदलेंगी… चेहरे बदलेंगे… लेकिन सिस्टम वही रहेगा… अगर जवाबदेही तय नहीं हुई…
अंतिम सवाल…
अगर छात्राओं की थाली में इल्ली मिलना भी “मैनेजेबल” है… तो फिर शर्म किस बात की बची है…?



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