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रक्षक ही बना भक्षक… झाबुआ में 7 साल की मासूम से दुष्कर्म का आरोपी आरक्षक गिरफ्तार, जेल भेजा और सिस्टम अब भी सवालों के घेरे में…

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✍️ संवाददाता: झाबुआ  |  🖊️ संपादन: MP जनमत

12 जनवरी 2025

झाबुआ

झाबुआ। जिस वर्दी को देखकर लोग सुरक्षित महसूस करते हैं, उसी वर्दी ने झाबुआ में भरोसा तोड़ दिया। सात साल की मासूम बच्ची से दुष्कर्म के गंभीर आरोप में एक पुलिस आरक्षक को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। मामला सामने आते ही पूरे जिले में आक्रोश फैल गया है। सवाल सिर्फ आरोपी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पुलिस सिस्टम की कार्यप्रणाली भी कटघरे में खड़ी हो गई है । आरोप है कि आरक्षक ने लंबे समय तक बच्ची को डर और लालच में रखकर उसका शोषण किया। बच्ची की उम्र महज सात साल है—इतनी कम कि वह अपराध और अपराधी का फर्क भी ठीक से न समझ सके।


मासूम की चुप्पी और मां की सतर्कता...


बताया जा रहा है कि बच्ची पिछले कुछ समय से डरी-डरी रहने लगी थी। न पहले जैसी बातें, न खेल-कूद, न हंसी। मां ने जब बेटी के व्यवहार में यह बदलाव देखा तो उसे शक हुआ। काफी पूछने पर बच्ची ने रोते हुए आपबीती बताई। सच सामने आते ही मां के पैरों तले जमीन खिसक गई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। बिना किसी दबाव में आए वह सीधे कोतवाली पहुंची और शिकायत दर्ज करवाई। यहीं से यह मामला दबने के बजाय उजागर हो सका।


एफआईआर में देरी और सवाल खड़े हो गए...


मामले में एफआईआर दर्ज होने में देरी को लेकर स्थानीय लोगों में नाराजगी है। सवाल उठ रहे हैं कि जब पीड़ित एक नाबालिग बच्ची है, तब कार्रवाई में संकोच क्यों हुआ...? लोगों का कहना है कि आरोपी पुलिस विभाग से जुड़ा था, इसी वजह से शुरुआती स्तर पर मामला गंभीरता से नहीं लिया गया। हालांकि वरिष्ठ अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद कार्रवाई तेज हुई।


गिरफ्तारी, मेडिकल और जेल...


पुलिस ने आरोपी आरक्षक को गिरफ्तार कर मेडिकल जांच करवाई और फिर न्यायालय में पेश किया। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपी को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया। आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराओं के साथ-साथ पॉक्सो एक्ट के तहत भी मामला दर्ज किया गया है।


रिकॉर्ड भी पूरी तरह साफ नहीं...


जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी आरक्षक का रिकॉर्ड पहले से विवादित रहा है। उसके व्यवहार को लेकर विभाग में पहले भी शिकायतें मिली थीं। इसके बावजूद उसे संवेदनशील जिम्मेदारियों पर तैनात किया गया था।
अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या सिर्फ आरोपी ही दोषी है या फिर उसे नजरअंदाज करने वाला सिस्टम भी बराबर का जिम्मेदार है।


जनता में गुस्सा, सख्त सजा की मांग...


घटना के बाद झाबुआ में आक्रोश का माहौल है। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने आरोपी को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग की है। लोगों का कहना है कि अगर कानून की रक्षा करने वाला ही अपराध करेगा, तो आम आदमी किस पर भरोसा करेगा। मांग की जा रही है कि मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो और इसे उदाहरण बनाया जाए।


पुलिस की छवि को गहरी चोट...


इस घटना ने खासकर आदिवासी अंचल में पुलिस की छवि को नुकसान पहुंचाया है। यहां पहले से ही पुलिस और जनता के बीच भरोसे की कमी मानी जाती है। ऐसे में यह मामला उस दूरी को और बढ़ा सकता है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि दोषी चाहे कोई भी हो, उसे बख्शा नहीं जाएगा और विभागीय स्तर पर भी सख्त कार्रवाई की जाएगी।


पीड़ित बच्ची के भविष्य का सवाल...


जानकारों का कहना है कि ऐसे मामलों में केवल गिरफ्तारी ही काफी नहीं होती। पीड़ित बच्ची को मानसिक परामर्श, सुरक्षा और भविष्य के लिए सहयोग देना भी उतना ही जरूरी है।
अगर समय रहते सही मदद नहीं मिली, तो यह आघात जीवनभर उसका पीछा कर सकता है। 

सिस्टम के लिए चेतावनी और समाज के लिए सवाल...


झाबुआ की यह घटना केवल एक अपराध नहीं है। यह सिस्टम के लिए चेतावनी है कि वर्दी के पीछे छुपे अपराध को नजरअंदाज करने की कीमत समाज को चुकानी पड़ती है।
अब देखना यह है कि यह मामला सिर्फ सुर्खियों तक सीमित रहेगा या फिर पुलिस व्यवस्था में सचमुच कोई सुधार होगा।
क्योंकि सवाल अब भी वही है... जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो मासूम किसके भरोसे जिए...?

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