सीएम हेल्पलाइन पर ‘झूठा निराकरण’ का खेल...? धारा 40–92 बेअसर, सचिवों के हाथ में अब भी पंचायतों का खजाना...
17 जनवरी 2026
धार
धार (शिवाजी चाैहान)। जिले के मनावर क्षेत्र में पंचायतों से जुड़ा धारा 40–92 का मामला अब एक साधारण प्रशासनिक चूक नहीं रहा। यह मामला तेजी से सिस्टम बनाम सच की लड़ाई बनता जा रहा है। शिकायतें दर्ज हुईं, आवेदन दिए गए, सुनवाई भी दिखाई गई, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि कार्रवाई आज भी शून्य है। सवाल सीधा है - जब कानून मौजूद है, तो डर क्यों नहीं...?
सीएम हेल्पलाइन 181 पर दर्ज शिकायतों के स्टेटस में बार-बार यह लिखा गया कि जांच में शिकायत “असत्य” पाई गई और संबंधित सचिवों को किसी पंचायत का वित्तीय प्रभार नहीं दिया गया। लेकिन दस्तावेज, स्क्रीनशॉट और स्थानीय हकीकत कुछ और ही कहानी कहते हैं। जिन सचिवों पर धारा 40 और 92 के प्रकरण लंबित हैं, वे आज भी दूसरी पंचायतों में जाकर वित्तीय पावर का इस्तेमाल कर रहे हैं। यही विरोधाभास इस पूरे मामले की रीढ़ है।

शिकायतकर्ता की असहमति के बावजूद शिकायत को एल-1, एल-2, एल-3 स्तरों पर घुमाकर “निराकरण” दर्ज करने की कोशिशें साफ दिखती हैं। सवाल उठता है - क्या यह केवल लापरवाही है, या फिर सफेदपोश पर्दे के पीछे बैठकर खेल रचा जा रहा है? अगर कार्रवाई नहीं करनी थी, तो सुनवाई का यह नाटक क्यों...?

शिकायतकर्ता ने साफ कहा है कि वह शिकायत बंद नहीं कराना चाहता। उसकी मांग सीधी है - वित्तीय अधिकारों से तुरंत मुक्त किया जाए और धारा 40–92 के तहत वास्तविक कार्रवाई हो। लेकिन इसके उलट, सीएम हेल्पलाइन पर दर्ज “निराकरण” जमीनी सच्चाई से मेल नहीं खाते। यह स्थिति केवल पंचायतों तक सीमित नहीं रहती; यह पूरे निगरानी तंत्र पर सवाल खड़े करती है।
यहां सवाल सीएम हेल्पलाइन 181 की विश्वसनीयता का भी है। जब शिकायतकर्ता की असहमति दर्ज होने के बावजूद मामला “क्लोज” करने की कोशिश होती है, तो जिम्मेदारी किसकी बनती है...? और क्या ऐसे निराकरणों की स्वतंत्र समीक्षा होगी...?
मामला जनपद पंचायत उमरबन से निकलकर अब जिले की पंचायत व्यवस्था पर सीधा वार कर रहा है। यदि धारा 40–92 जैसे सख्त प्रावधान भी कागज़ों तक सीमित रह जाएं, तो भ्रष्टाचार पर लगाम की बात सिर्फ भाषण बनकर रह जाएगी।
काल रिसीव नहीं किया
इस गंभीर मामले पर जनपद पंचायत उमरबन के सीईओ रोहित पचौरी का पक्ष जानने के लिए एमपी जनमत की ओर से लगातार कई बार उनके मोबाइल नंबर पर संपर्क किया गया, लेकिन हर बार कॉल रिसीव नहीं की गई। समाचार लिखे जाने तक न तो सीईओ की ओर से कोई प्रतिक्रिया मिली और न ही कोई स्पष्टीकरण सामने आया। ऐसे में धारा 40–92 जैसे गंभीर मामलों पर सीईओ की चुप्पी खुद कई सवाल खड़े करती है और प्रशासनिक पारदर्शिता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।
अभी निगाहें धार जिला प्रशासन पर हैं। क्या वह सीएम हेल्पलाइन पर हुए इन “निराकरणों” की निष्पक्ष ऑडिट कराएगा...? क्या वित्तीय प्रभार वाले सचिवों पर तत्काल प्रभावी कार्रवाई होगी...? या फिर यह मामला भी फाइलों के ढेर में दबा दिया जाएगा...?
क्योंकि सच यही है - अगर आज कानून बेअसर रहा, तो कल पंचायत व्यवस्था पर जनता का भरोसा भी बेअसर हो जाएगा।






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