झोन-10 के सामने खुलेआम नियमों की धज्जियां: पार्किंग बनी ब्लड बैंक, सड़क बनी स्टैंड...G+3 नक्शे पर 6 मंजिल खड़े मेडिकेयर हॉस्पिटल के अवैध निर्माण पर निगम की रहस्यमयी चुप्पी...
20 जनवरी 2026
इंदाैर
तीन मंजिल की अनुमति, हकीकत में छह फ्लोर…
पार्किंग बना दी ब्लड बैंक, सड़क-फुटपाथ पर खड़े वाहन...
इंदौर (अरविंद आर. तिवारी)। महानगर में अवैध निर्माण और नियमों के उल्लंघन पर सख्ती के दावों के बीच एक ऐसा मामला सामने आया है, जो न सिर्फ नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह भी बताता है कि प्रभावशाली संस्थानों के सामने नियम किस तरह बौने हो जाते हैं। नगर निगम के झोन-10 कार्यालय के ठीक सामने, ओल्ड पलासिया क्षेत्र के रवींद्र नगर में संचालित मेडिकेयर हॉस्पिटल में वर्षों से नियमों को ताक पर रखकर निर्माण और संचालन किया जा रहा है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से निगम अधिकारी इस पर कार्रवाई करने में कोई रुचि नहीं दिखा रहे हैं।

यह मामला केवल एक अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम की तस्वीर पेश करता है जहां शिकायतें आती हैं, दस्तावेज मौजूद हैं, मौके पर सच्चाई साफ दिखती है, फिर भी कार्रवाई फाइलों से बाहर नहीं निकल पाती।
नक्शा कुछ, निर्माण कुछ : कैसे खड़ी हो गई छह मंज़िल
जानकारी के अनुसार वर्ष 2009 में नगर निगम द्वारा लाहोटी मेडिकेयर प्राइवेट लिमिटेड के नाम से डॉ. राजेंद्र कुमार हेतु अस्पताल का नक्शा स्वीकृत किया गया था। यह नक्शा जी प्लस 3 (G+3) यानी कुल तीन मंज़िल निर्माण के लिए पास हुआ था। नियमों के तहत तय एफएसआई, एमओएस (ओपन स्पेस) और पार्किंग व्यवस्था के साथ यह अनुमति दी गई थी।
लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। अस्पताल परिसर में छह मंज़िल तक निर्माण कर लिया गया है। यानी स्वीकृत सीमा से दोगुना। सवाल यह है कि इतनी बड़ी अवैध संरचना कैसे खड़ी हो गई और निगम के निरीक्षण तंत्र ने इसे कैसे नजरअंदाज किया...?
बेसमेंट पार्किंग सिर्फ कागजाें में
नक्शे में अस्पताल के पूरे बेसमेंट को पार्किंग के लिए स्वीकृत किया गया था। नियम साफ कहते हैं कि अस्पताल जैसी संस्थाओं में पर्याप्त पार्किंग अनिवार्य होती है, ताकि सड़क और सार्वजनिक स्थानों पर दबाव न पड़े।
लेकिन मेडिकेयर हॉस्पिटल में बेसमेंट का इस्तेमाल पार्किंग के बजाय ब्लड बैंक, कैंटीन और अन्य कार्यालयों के रूप में किया जा रहा है। यह न केवल भवन अनुमति का उल्लंघन है, बल्कि अग्नि सुरक्षा और आपदा प्रबंधन जैसे मानकों के लिए भी गंभीर खतरा है।

लोगों और प्रशासन को गुमराह करने के लिए अस्पताल प्रबंधन ने ग्राउंड फ्लोर पर एक बोर्ड लगाया है, जिसमें पार्किंग बेसमेंट में दर्शाई गई है। मगर वास्तविकता यह है कि बेसमेंट में एक-दो साइकिल के अलावा कोई वाहन नजर नहीं आता।
सड़क और फुटपाथ बने अस्पताल की पार्किंग
जब बेसमेंट में पार्किंग उपलब्ध नहीं कराई गई, तो इसका सीधा असर सड़क और फुटपाथ पर पड़ा। अस्पताल में आने वाले मरीजों, उनके परिजनों और स्टाफ के वाहन सार्वजनिक सड़क और फुटपाथ पर खड़े कराए जा रहे हैं। इससे न सिर्फ ट्रैफिक बाधित होता है, बल्कि पैदल चलने वालों के लिए भी खतरा पैदा होता है।
यह स्थिति और भी गंभीर इसलिए है क्योंकि यह सब नगर निगम झोन-10 कार्यालय के ठीक सामने हो रहा है। यानी अधिकारी रोज़ इस अव्यवस्था को देखते हैं, फिर भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता।
एमओएस पूरी तरह खत्म, नियमों की खुली अवहेलना
भवन निर्माण नियमों के तहत अस्पताल परिसर में एमओएस (Mandatory Open Space) छोड़ा जाना अनिवार्य है, ताकि हवा, रोशनी और आपात स्थितियों में सुरक्षित निकासी संभव हो सके।
मेडिकेयर हॉस्पिटल में यह एमओएस भी पूरी तरह कवर कर लिया गया है। इसके बावजूद न तो नोटिस, न सीलिंग, न ही निर्माण हटाने की कोई प्रभावी कार्रवाई देखने को मिली।
पड़ोस की मल्टियों पर दबाव, रहवासी परेशान
बताया जा रहा है कि अस्पताल प्रबंधन ने पास की कुछ मल्टियों में एक-दो फ्लैट खरीद लिए, ताकि वहां की पार्किंग का इस्तेमाल किया जा सके। इसके बावजूद जगह कम पड़ने पर सड़क और फुटपाथ पर वाहन खड़े होते हैं।
स्थानीय रहवासी बताते हैं कि आए दिन पार्किंग को लेकर विवाद होता है, रास्ता जाम रहता है और एंबुलेंस या आपात सेवाओं के लिए भी रास्ता संकरा हो जाता है।
शिकायतों के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं..?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब नक्शा उल्लंघन स्पष्ट है, बेसमेंट का दुरुपयोग सामने है, एमओएस खत्म किया जा चुका है, और सड़क-फुटपाथ पर अतिक्रमण रोज दिख रहा है, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही...?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि निगम अधिकारी सिर्फ कागजी खानापूर्ति कर रहे हैं। कभी निरीक्षण की बात, कभी पत्राचार, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। इससे यह आशंका भी गहराती है कि कहीं न कहीं प्रशासनिक संरक्षण तो नहीं मिल रहा।
निगम की साख पर सवाल
इंदौर नगर निगम समय-समय पर अवैध निर्माण के खिलाफ अभियान चलाने और सख्ती के दावे करता रहा है। आम नागरिक का छोटा सा निर्माण भी नियमों से हटते ही नोटिस और कार्रवाई की जद में आ जाता है। लेकिन जब मामला बड़े अस्पताल या प्रभावशाली संस्थान का हो, तो नियम लचीले क्यों हो जाते हैं...?
यह दोहरा मापदंड न केवल कानून के राज की अवधारणा को कमजोर करता है, बल्कि जनता के भरोसे को भी चोट पहुंचाता है।
अगर नगर निगम वास्तव में शहर को व्यवस्थित और सुरक्षित बनाना चाहता है, तो उसे ऐसे मामलों में बिना भेदभाव सख़्त कदम उठाने होंगे। वरना झोन-10 के सामने खड़ा यह अवैध निर्माण आने वाले समय में निगम की निष्क्रियता का सबसे बड़ा प्रतीक बन जाएगा।





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