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पंचायत में बड़ा खेल! बिना फर्म संचालन के ‘ॐ साईं सप्लायर्स’ के नाम भुगतान, सरपंच की अनभिज्ञता पर सवाल...

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✍️ संवाददाता: धार  |  🖊️ संपादन: MP जनमत

29 जनवरी 2026

धार

धार (शिवाजी चाैहान)। जिले की जनपद पंचायत धरमपुरी अंतर्गत ग्राम पंचायत मोरगढ़ी में पंचायत के पैसों के उपयोग को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। आरोप है कि बिना किसी वास्तविक दुकान या फर्म के संचालन के ही कथित ‘ॐ साईं सप्लायर्स’ के नाम से कच्चे बिल लगाकर पंचायत की राशि निकाली गई। इस पूरे मामले ने पंचायत व्यवस्था, जनपद स्तर के अधिकारियों और तकनीकी अमले की भूमिका पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

यही ग्राम पंचायत मोरगढ़ी का कार्यालय है, जहां से विकास कार्यों के नाम पर भुगतान की प्रक्रिया होती है। ग्रामीण अब पंचायत में पारदर्शिता और हर भुगतान का सार्वजनिक हिसाब मांग रहे हैं।

स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि जिन बिलों के आधार पर भुगतान किया गया, उनकी न तो मौके पर जांच की गई और न ही यह सत्यापित किया गया कि संबंधित फर्म वास्तव में अस्तित्व में है या नहीं। हैरानी की बात यह भी बताई जा रही है कि इन भुगतानों में सरपंच के हस्ताक्षर तक नहीं थे। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या सरपंच इस पूरे घटनाक्रम से अनजान हैं या फिर जानबूझकर चुप्पी साधे हुए हैं।

ग्राम पंचायत मोरगढ़ी में लगाए गए बिल में सप्लायर के संचालन, दुकान और सत्यापन से जुड़ी जानकारी स्पष्ट नहीं है, इसके बावजूद पंचायत की राशि आहरित किए जाने के आरोप हैं।

सूत्रों के अनुसार ग्राम पंचायत मोरगढ़ी में काफी समय से कच्चे बिलों के आधार पर भुगतान का खेल चल रहा है। सामान की आपूर्ति, गुणवत्ता और जरूरत की कोई ठोस पुष्टि नहीं की गई, लेकिन इसके बावजूद भुगतान होते रहे। आरोप है कि यह सब नियमों को ताक पर रखकर किया गया और पंचायत की राशि का दुरुपयोग हुआ।

        इस मामले में अब कमीशन और बंदरबांट की चर्चा भी खुलकर सामने आने लगी है। बताया जा रहा है कि भुगतान के बदले कमीशन का खेल चलता रहा और पंचायत से लेकर जनपद स्तर तक कुछ लोगों के बीच बंदरबांट की गई। इसी कारण न तो बिलों की गंभीर जांच हुई और न ही किसी स्तर पर आपत्ति दर्ज की गई। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर निष्पक्ष जांच हो, तो कई नाम सामने आ सकते हैं।

दूसरे बिल में भी सामग्री आपूर्ति और फर्म की मौजूदगी को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। स्थानीय स्तर पर इसे कमीशन और बंदरबांट से जोड़कर देखा जा रहा है।

विश्वसनीय सूत्र यह भी दावा कर रहे हैं कि धरमपुरी जनपद में पदस्थ एक इंजीनियर के रिश्तेदार का नाम इस पूरे मामले से जोड़ा जा रहा है। कहा जा रहा है कि लंबे समय से इसी तरह के कामों को अंजाम दिया जा रहा है, लेकिन जनपद पंचायत के जिम्मेदार अधिकारियों ने आंखें मूंद रखी हैं। यह सवाल अब जोर पकड़ रहा है कि आखिर किसके संरक्षण में यह सब चल रहा था।

       जब बिलों के भुगतान की प्रक्रिया होती है, उस दौरान सहायक यंत्री की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आरोप है कि या तो जानबूझकर अनदेखी की गई या फिर कमीशन और बंदरबांट के चलते बिना जांच-पड़ताल के भुगतान को मंजूरी दे दी गई। तकनीकी स्तर पर जांच नहीं होने से इस पूरे मामले की गंभीरता और बढ़ जाती है।


ग्राम पंचायत मोरगढ़ी में इस कथित गड़बड़ी को लेकर उप-सरपंच ने पहले भी मोर्चा खोला था। उन्होंने जनपद पंचायत के अधिकारियों को शिकायती आवेदन दिए और पूरे मामले की जांच की मांग की। इसके बावजूद आज दिनांक तक न तो किसी प्रकार की ठोस जांच सामने आई और न ही शिकायतों का कोई स्पष्ट निराकरण किया गया। इससे साफ है कि शिकायतें फाइलों में दबकर रह गईं।


अब इस मामले में सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) का सहारा भी लिया गया है। पंचायत और जनपद पंचायत से बिलों, भुगतान, फर्म की जानकारी और संबंधित दस्तावेज मांगे गए हैं, लेकिन आरोप है कि समयसीमा के भीतर जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है। सूचना देने में की जा रही देरी से यह संदेह और गहरा हो गया है कि कहीं न कहीं कुछ छिपाने की कोशिश की जा रही है।


RTI कार्यकर्ताओं का कहना है कि सूचना का अधिकार पारदर्शिता के लिए बनाया गया कानून है, लेकिन जब अधिकारी समय पर जानकारी नहीं देते, तो यह खुद में एक बड़ा सवाल बन जाता है। यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ होता, तो जानकारी देने में देरी क्यों की जा रही है, यह समझ से परे है। क्यूंकि वैसे भी अधिकांश मामले में यह कह दिया जाता है कि जानकारी मांगने से बेहतर है पंचायत की जानकारी पाेर्टल पर देख लाे वहां सबकुछ ताे जानकारी है।

           स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि पंचायत की राशि जनता की गाढ़ी कमाई होती है, जिसका उपयोग विकास कार्यों के लिए होना चाहिए। यदि यह राशि कागजों और कच्चे बिलों के सहारे कमीशन और बंदरबांट में चली जाए, तो गांव के विकास पर सीधा असर पड़ता है।


मोरगढ़ी पंचायत का यह मामला अब केवल एक पंचायत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह जनपद पंचायत धरमपुरी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर रहा है। ग्रामीणों की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो और पंचायत के पैसों का हिसाब सार्वजनिक किया जाए।

         अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेकर जांच कराता है या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो पंचायत व्यवस्था पर जनता का भरोसा और कमजोर हो सकता है।

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