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पेटलावद हादसे की दसवीं बरसी... दस साल बाद भी पेटलावद का जख्म ताजा... बरसी पर सीएम के मंच से गायब रही संवेदनाएँ...

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✍️ संवाददाता: झाबुआ  |  🖊️ संपादन: MP जनमत

13 सितंबर 2025

झाबुआ

झाबुआ/पेटलावद। आज से दस साल पहले पेटलावद ने वो हृदयविदारक मंजर देखा था जिसे याद कर आज भी रूह काँप उठती है। धमाके में असंख्य मासूमों की जिंदगियाँ पलभर में मिट गईं पूरा इलाका मातम में डूब गया और देशभर की निगाहें इस छोटे कस्बे पर टिक गई थीं। कल उसी दर्दनाक हादसे की... दसवीं बरसी थी।

लेकिन अफसोस... दस साल बाद भी सत्ता की राजनीति ने उस त्रासदी की यादों को मंच से गायब कर दिया। कल मुख्यमंत्री पेटलावद पहुँचे। मंच पर सांसद विधायक मंत्री और आला अधिकारी मौजूद थे। भाषण हुए योजनाएँ गिनाई गईं घोषणाएँ की गईं... लेकिन उस दिन का नाम तक किसी ने नहीं लिया। श्रद्धांजलि के लिए न एक शब्द न ही एक मिनट का मौन।

मुख्यमंत्री के कार्यक्रम का प्रसारित हुआ विडियो साफ गवाही देता है कि नेताओं के लिए हादसे का ज़िक्र करना भी शायद बोझिल लगा। जनता की कसक यही है... काश मुख्यमंत्री मंच से हादसे के शहीदों को याद कर कुछ शब्द कह देते... तो पीड़ा का बोझ थोड़ा हल्का हो जाता।सांसद निर्मला भूरिया भले ही श्रद्धांजलि चौक पर पहुँचकर पुष्प अर्पित कर आईं लेकिन मंच से उन्हें भी याद दिलाना उचित नहीं लगा। सवाल यह है... क्या मंच पर शहीदों को याद करना नेताओं के एजेंडे में कभी रहा ही नहीं...

जनता कह रही है... हर साल श्रद्धांजलि चौक पर मोमबत्तियाँ जलती हैं परिवार आंसुओं में डूब जाते हैं लेकिन मंच पर बैठी राजनीति की ज़ुबान पर हादसे काे लेकर खामोशी क्यूं छा जाती है।

अब आवाज उठ रही है कि ...12 सितंबर को पेटलावद स्मृति दिवस घोषित किया जाए... ताकि यह त्रासदी केवल पीड़ित परिवारों तक सीमित न रह जाए बल्कि सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी भी हर साल ताज़ा होती रहे।पेटलावद हादसा जनता के दिलों में आज भी जिंदा है... लेकिन नेताओं की याददाश्त... शायद मंच पर मर जाती है।

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