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धार जिले की पंचायतों में गड़बड़ी का जाल… उमरबन में सरपंच-परिजनों को भुगतान, धरमपुरी में ‘साईं सप्लायर’ और इंजीनियर कनेक्शन पर सवाल

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✍️ संवाददाता: धरमपुरी  |  🖊️ संपादन: MP जनमत

14 मार्च 2026

धरमपुरी

धरमपुरी। धार जिले की पंचायत व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। जिले की उमरबन और धरमपुरी जनपद पंचायत से जुड़े मामलों में वित्तीय अनियमितताओं और फर्जी भुगतान के आरोप सामने आ रहे हैं। आरोप है कि कुछ ग्राम पंचायतों में नियमों को ताक पर रखकर सरपंच और उनके परिजनों के नाम भुगतान किए गए, जबकि दूसरी ओर धरमपुरी क्षेत्र में एक ही फर्म के जरिए बड़े पैमाने पर बिल लगाकर राशि निकाले जाने की बात सामने आ रही है। इन दोनों मामलों ने पंचायत व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।


सूत्रों के अनुसार उमरबन जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाली कई ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के नाम पर ऐसे भुगतान किए गए, जो सीधे तौर पर सरपंच या उनके परिवार के सदस्यों से जुड़े बताए जा रहे हैं। पंचायत नियमों के अनुसार सरपंच या उनके निकट संबंधियों को सीधे लाभ पहुंचाने वाले भुगतान करना नियम विरुद्ध माना जाता है। इसके बावजूद कुछ पंचायतों में कथित तौर पर सरपंच और उनके परिजनों के नाम से बिल लगाकर राशि आहरित किए जाने के आरोप लग रहे हैं।


बताया जा रहा है कि कई मामलों में निर्माण सामग्री या अन्य कार्यों के नाम पर बिल लगाए गए, जबकि वास्तविक कार्य और सामग्री की उपलब्धता को लेकर संदेह जताया जा रहा है। यदि इन मामलों की गहन जांच होती है तो यह स्पष्ट हो सकता है कि पंचायत निधि का उपयोग वास्तविक विकास कार्यों में हुआ या केवल कागजी बिलों के सहारे राशि निकाली गई।


दूसरी ओर धरमपुरी जनपद पंचायत में भी एक अलग तरह का मामला सामने आया है। यहां “श्री साईं सप्लायर” नाम की फर्म चर्चा में है। आरोप है कि इस फर्म के जरिए पंचायतों में बड़े पैमाने पर बिल लगाए गए और भुगतान भी हुए। सबसे गंभीर आरोप यह है कि इस फर्म का संबंध पंचायत के एक इंजीनियर के रिश्तेदार से बताया जा रहा है। यदि यह तथ्य सही पाया जाता है तो यह हितों के टकराव और नियमों के उल्लंघन का मामला बन सकता है।


सूत्रों के मुताबिक धरमपुरी क्षेत्र की पंचायतों में रेत, मुरम, गिट्टी, पत्थर और सीमेंट जैसी निर्माण सामग्री के नाम पर लाखों रुपये के बिल लगाए गए। इनमें से अधिकतर सामग्री खनिज श्रेणी में आती है, जिस पर शासन को रॉयल्टी भी देनी होती है। लेकिन इन बिलों में खनिज आपूर्ति दर्शाने के बावजूद रॉयल्टी जमा किए जाने के पर्याप्त प्रमाण सामने नहीं आ रहे हैं। इससे यह आशंका भी जताई जा रही है कि पंचायतों में भुगतान के साथ-साथ खनिज रॉयल्टी की भी चोरी की गई।


इस पूरे मामले में यह भी सवाल उठ रहा है कि जिन फर्मों के नाम से लाखों रुपये के बिल लगाए गए, क्या उनके पास वास्तव में इतना बड़ा कारोबार करने की क्षमता और वैध पूंजी थी। यदि यह फर्में केवल कागजों पर संचालित पाई जाती हैं तो यह मामला वित्तीय अनियमितता के साथ-साथ कर चोरी तक पहुंच सकता है।


स्थानीय स्तर पर चर्चा यह भी है कि इन मामलों की जानकारी प्रशासन तक पहुंचने के बावजूद अब तक कोई बड़ी कार्रवाई सामने नहीं आई है। इससे लोगों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या इन मामलों के पीछे किसी प्रकार का राजनीतिक संरक्षण, कमीशनखोरी या प्रशासनिक उदासीनता काम कर रही है।
पंचायत व्यवस्था का मूल उद्देश्य गांवों में पारदर्शी और जवाबदेह विकास कार्य कराना है। लेकिन यदि पंचायतों में ही फर्जी बिल, रिश्तेदारी कनेक्शन और नियमों की अनदेखी के आरोप लगने लगें तो इससे पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।


अब जरूरत इस बात की है कि उमरबन और धरमपुरी दोनों जनपद पंचायतों में हुए भुगतान की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि जांच में अनियमितता सामने आती है तो संबंधित जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होना भी उतना ही जरूरी है, ताकि पंचायत निधि का दुरुपयोग रोका जा सके और जनता का भरोसा कायम रह सके।

एमपी जनमत इस पूरे मामले की पड़ताल कर रहा है और आगे भी इससे जुड़े तथ्यों और दस्तावेजों के साथ खुलासे जारी रखेगा।

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