वर्षों से एक ही जगह जमे पुलिसकर्मी, क्या नवागत एसपी करेंगे बड़ा फेरबदल... झाबुआ पुलिस में रोटेशन सिस्टम पर सवाल, आखिर कौन बचा रहा वर्षों से जमे चेहरों को...?
13 मई 2026
झाबुआ
✍️ ऋतिक विश्वकर्मा | MP जनमत
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झाबुआ जिले में नए पुलिस कप्तान की आमद के साथ ही पुलिस महकमे के भीतर वर्षों से दबे सवाल फिर सतह पर तैरने लगे हैं... सवाल इस बात के... कि क्या अब वास्तव में उन पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई होगी जो बरसों से एक ही जगह जमे बैठे हैं...
पुलिस मुख्यालय भोपाल से कुछ महीने पहले ही स्पष्ट निर्देश जारी हुए थें कि लंबे समय से एक ही कार्यालय... एक ही शाखा... अथवा एक ही क्षेत्र में पदस्थ कर्मचारियों का समय-समय पर परिवर्तन किया जाए... ताकि व्यवस्था में पारदर्शिता बनी रहे... लेकिन झाबुआ जिले की तस्वीर कुछ अलग ही कहानी कहती दिखाई देती है...
जिले के कई थानों... चौकियों और शाखाओं में ऐसे पुलिसकर्मियों की चर्चा आम है जो वर्षों से एक ही क्षेत्र में डटे हुए हैं... कुछ तो ऐसे बताए जाते हैं जिन्होंने आरक्षक से लेकर हेड कांस्टेबल... और फिर एएसआई तक का सफर लगभग एक ही इलाके में पूरा कर लिया... कागजों में तबादले जरूर हुए... लेकिन जमीनी हकीकत में चेहरे वहीं के वहीं दिखाई देते रहे...
सूत्र बताते हैं कि जिले में कुछ पोस्टिंग ऐसी मानी जाती हैं जहां ‘मलाई’ अधिक है... और यही कारण है कि वहां से हटने के बाद भी वापसी की कोशिशें शुरू हो जाती हैं... कभी सिफारिश... कभी दबाव... तो कभी अंदरूनी समीकरण... और फिर वही पुराना ठिकाना... यही चर्चा इन दिनों पुलिस महकमे के गलियारों में सबसे ज्यादा सुनाई दे रही है...
पुलिस व्यवस्था में लंबे समय तक एक ही जगह जमे रहने का असर केवल विभाग तक सीमित नहीं रहता... धीरे-धीरे स्थानीय समीकरण मजबूत होने लगते हैं... पहचानें रिश्तों में बदल जाती हैं... और रिश्ते कई बार निष्पक्ष कार्रवाई पर भी सवाल खड़े कर देते हैं... यही कारण है कि पुलिस मुख्यालय समय-समय पर रोटेशन व्यवस्था को जरूरी मानता रहा है...

झाबुआ जैसे आदिवासी जिले में पुलिस और जनता के बीच विश्वास सबसे बड़ी पूंजी माना जाता है... लेकिन जब वर्षों तक एक ही चेहरे... एक ही क्षेत्रों में बने रहते हैं तो फिर चर्चाएं भी जन्म लेने लगती हैं... कौन कहां मजबूत है... किसकी कहां पकड़ है... और कौन किसके संरक्षण में चल रहा है...
अब निगाहें नवागत पुलिस कप्तान देवेन्द्र पाटीदार पर टिक गई हैं... क्या वे वर्षों से जमे पुलिसकर्मियों की सूची निकलवाएंगे... क्या सेवा रिकॉर्ड खंगाले जाएंगे... क्या वास्तविक रूप से स्थानांतरण होंगे... या फिर यह आदेश भी बाकी आदेशों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा... झाबुआ जिले में इन दिनों बस यही चर्चा है... अब उम्मीदें है कि कप्तान बदले है ताे कप्तान व्यवस्था भी बदलेगें...





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